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Divorced Muslim women entitled for maintenence under CrPC: SC 12239959




तलाकशुदा मुस्लिम महिला को भी गुजारा-भत्ता

नई दिल्ली [माला दीक्षित]। तलाकशुदा मुस्लिम महिला को सामान्य कानून के तहत पति से गुजारा-भत्ता लेने के अधिकार पर सुप्रीमकोर्ट ने एक बार फिर अपनी मुहर लगा दी है। कोर्ट के आदेश से तलाकशुदा मुस्लिम महिला को 4000 रुपये प्रतिमाह गुजारा-भत्ता मिलेगा। सुप्रीमकोर्ट ने तलाकशुदा मुस्लिम पत्नी को सीआरपीसी की धारा 125 के तहत गुजाराभत्ता देने के परिवार अदालत के आदेश को सही ठहराया है। कोर्ट ने गुजारेभत्ते की रकम घटाने का हाईकोर्ट का आदेश निरस्त कर दिया है।



ये फैसला न्यायमूर्ति दीपक मिश्रा व न्यायमूर्ति पीसी पंत की पीठ ने उत्तर प्रदेश की रहने वाली शमीमा फारुकी की याचिका स्वीकार करते हुए सुनाया है। हालांकि इस मामले में सुप्रीमकोर्ट के नोटिस के बावजूद पति की ओर से कोई पेश नहीं हुआ था। सुप्रीमकोर्ट ने फैसले में बदलते समय के साथ नारी अधिकार और नारी स्वतंत्रता का जिक्र करते हुए कहा है कि अब पुरुषवादी मानसिकता का कोई औचित्य नहीं रह गया है।



पत्नी का पब जाना तलाक का आधार नहीं: हाईकोर्ट



कोर्ट ने तलाकशुदा मुस्लिम महिला को सीआरपीसी की धारा 125 के तहत पति से गुजारा-भत्ता दिलाए जाने के अपने पूर्व फैसलों का हवाला देते हुए कहा है कि परिवार अदालत द्वारा इस धारा के तहत गुजारा-भत्ता दिये जाने का आदेश बिल्कुल सही है। इस मामले में परिवार अदालत ने शमीमा के पति शाहिद खान की ये दलील खारिज कर दी थी कि मुस्लिम महिला सीआरपीसी की धारा 125 के तहत गुजारा-भत्ता नहीं मांग सकती। परिवार अदालत ने कहा था कि मुस्लिम महिला तलाक के बाद भी धारा 125 के तहत परिवार अदालत में गुजारे भत्ते के लिए अर्जी दे सकती है।



परिवार अदालत ने सेना में नौकरी करने वाले शाहिद खान की मासिक आय को देखते हुए 4000 रुपये प्रतिमाह गुजारा भत्ता देने का आदेश दिया था। कहा था कि जबतक पत्नी दोबारा शादी नहीं करती उसे गुजारा भत्ता दिया जाता रहेगा। परिवार अदालत ने याचिका दाखिल करने की तिथि से फैसला सुनाए जाने की तिथि तक का 2500 रुपए प्रतिमाह अलग से अदा करने का आदेश दिया था। फैसले से नाखुश शाहिद ने हाईकोर्ट में अपील की और शाहिद के सेवानिवृत हो जाने के आधार पर हाईकोर्ट ने गुजारे भत्ते की घटा कर 2000 रुपये प्रतिमाह कर दी थी। हालांकि 2500 रुपये प्रतिमाह एरियर के आदेश में कोई बदलाव नहीं किया था। हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ शमीमा सुप्रीमकोर्ट आयी थी।



सुप्रीमकोर्ट ने हाईकोर्ट का आदेश निरस्त करते हुए कहा कि पत्नी का भरण पोषण करना पति का दायित्व है। अगर पति कमाने लायक है तो आर्थिक रूप से असमर्थ होने का बहाना बना कर अपनी जिम्मेदारी ने नहीं बच सकता। इस आरोप को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता कि पति ने गुजारे भत्ते की जिम्मेदारी से बचने के लिए परिवार अदालत के फैसले के बाद स्वैच्छिक सेवानिवृति ले ली थी।



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क्या है मामला



उत्तर प्रदेश की रहने वाली शमीमा फारुकी की 26 अप्रैल 1992 को शाहिद खान से शादी हुई थी। शमीमा का आरोप था कि शाहिद शादी के बाद उसे अन्य लोगों से बात नहीं करने देता था। उसे न सिर्फ प्रताडि़त किया जाता था बल्कि उसके परिवार से कार की भी मांग की जाती थी। प्रताड़ना से परेशान होकर वह मायके आ गई। 1998 में उसने परिवार अदालत मे अर्जी देकर धारा 125 में पति से गुजारा भत्ता दिलाने की मांग की। पति ने आरोपों से इन्कार करते हुए कहा कि वह उसे तलाक दे चुका है और मेहर भी अदा कर चुका है इसलिए धारा 125 में गुजारे भत्ते की अर्जी नहीं सुनी जा सकती।



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(Hindi news from Dainik Jagran, newsnational Desk)





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