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Vivisection is not even in the name of traditions 12371306




परंपराओं के नाम पर भी न हो जीव हत्या

मुंबई। पर्यावरणवादियों को केंद्र सरकार द्वारा बनाई जा रही वन्यजीवन नीति में परंपराओं की आड़ में जीवों की हत्या की छूट देने का प्रस्ताव रास नहीं आ रहा है। बॉम्बे नेचुरल हिस्ट्री सोसायटी सहित पर्यावरण के लिए काम कर रहे कई संगठनों ने पर्यावरण एवं वन मंत्रालय को पत्र लिखकर इस नीति का बदलने की गुहार लगाई है।




केंद्र सरकार का पर्यावरण एवं वन मंत्रालय वन्यजीवन नीति तैयार कर रहा है। इस नीति का ड्राफ्ट मंत्रालय ने विभिन्न पर्यावरण संगठनों को भेजा है। ताकि वे अपने सुझाव पेश कर सकें। इस ड्राफ्ट पॉलिसी में सरकार ने शिकार के लिए जीवों की हत्या एवं परंपराओं के लिए जीवों की हत्या में फर्क करने का प्रस्ताव रखा है।



पर्यावरणविदों का मानना है कि सरकार ने समाज के विभिन्न समुदायों एवं कानून का पालन करवानेवाली एजेंसियों के बीच टकराव टालने के लिए यह फर्क रखना चाहती है। देश भर में वन्य जीवों पर शोध करनेवाले 131 साल पुरानी संस्था बॉम्बे नेचुरल हिस्ट्री सोसायटी (बीएनएचएस) सहित आरण्यक, वाइल्डलाइफ प्रोटेक्शन सोसायटी ऑफ इंडिया, ट्रैफिक-इंडिया एवं वाइल्ड लाइफ सोसायटी ऑफ उड़ीसा जैसी कई और प्रमुख पर्यावरण संस्थाएं नई वन्यजीवन नीति में जीव हत्या को लेकर यह फर्क नहीं देखना चाहतीं। उन्होंने मंत्रालय को पत्र लिखकर ड्राफ्ट पॉलिसी में यह प्रस्ताव रद्द करने का सुझाव दिया है।




बीएनएचएस का मानना है कि भारतीय समाज में जीवों के उपयोग के लिए बनाई गई ज्यादातर परंपराओं का आधार वैज्ञानिक रहा है। लेकिन कालांतर में इनका उपयोग अंधविश्वास के रूप में होने लगा। बीएनएचएस के प्रवक्ता अतुल साठे कहते हैं कि नागपंचमी के अवसर पर सांपों की पूजा का विधान इसलिए था, क्योंकि सांप चूहों से फसलों की रक्षा करते थे। लेकिन पहले यह सर्प पूजन सांपों की बिल के पास जाकर उनसे छेड़छाड़ किए बिना ही किया जाता था।



जबकि बाद में नागपंचमी पर लोगों को सर्पदर्शन कराने के नाम पर सांपों को पकड़ा जाने लगा। साठे के अनुसार परंपराओं एवं काले जादू के लिए जीवों को पकड़ना और उनकी हत्या उनकी संख्या लगातार कम करती जा रही है। इसलिए वन्यजीव नीति में परंपराओं के नाम पर जीवों क की हत्या पर भी उसी प्रकार प्रतिबंध लगना चाहिए, जैसे शिकार करने पर होता है।



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Web Title:Vivisection is not even in the name of traditions


(Hindi news from Dainik Jagran, newsnational Desk)






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